26 जुलाई 2026। सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम, 2005 के तहत शासकीय कर्मचारियों के व्यक्तिगत दस्तावेजों, सर्विस रिकॉर्ड और निजी जानकारियों को सुरक्षा प्रदान करने वाले उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय के निर्णयों का अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संरक्षण आयोग (छत्तीसगढ़ प्रदेश) ने स्वागत किया है।

आयोग ने स्पष्ट किया है कि सर्विस रिकॉर्ड लोक सेवक की निजी जानकारी के दायरे में आता है, जिसे बिना कर्मचारी की सहमति या बिना व्यापक जनहित सिद्ध किए आरटीआई में साझा नहीं किया जा सकता।

बिलासपुर हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के महत्वपूर्ण न्यायिक दृष्टांत

हाल ही में बिलासपुर हाईकोर्ट ने रायगढ़ जिले के लैलूंगा में पदस्थ पटवारी रामनाथ सिंह की याचिका (W.P.(C) No. 3645 of 2026) पर निर्णय देते हुए स्पष्ट किया है कि शासकीय सेवकों के जाति, निवास, शैक्षणिक दस्तावेज, हलफनामे और सर्विस रिकॉर्ड धारा 8(1)(j) के तहत संरक्षित हैं।

प्रमुख न्यायिक निर्णय (Judicial Precedents):

गिरीश रामचंद्र देशपांडे बनाम केंद्रीय सूचना आयुक्त (2013, सुप्रीम कोर्ट): कर्मचारियों के सर्विस रिकॉर्ड, शो-कॉज नोटिस, संपत्ति का ब्योरा और अनुशासनात्मक कार्रवाई के दस्तावेज 'निजी जानकारी' हैं।

कैनरा बैंक बनाम सी.एस. श्याम (2018, सुप्रीम कोर्ट): ट्रांसफर, पदोन्नति और वेतन से जुड़ी निजी जानकारी देना आरटीआई के तहत अनिवार्य नहीं है।

प्रद्युमन शर्मा की अपील: पारदर्शी शासन और निजता में संतुलन जरूरी

अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संरक्षण आयोग के अध्यक्ष प्रद्युमन शर्मा ने कहा कि पारदर्शिता और जवाबदेही के साथ-साथ लोक सेवकों की निजता के अधिकार की रक्षा भी उतनी ही आवश्यक है। आरटीआई का उपयोग अधिकारियों को परेशान करने या निजी वैमनस्य निकालने के लिए नहीं किया जाना चाहिए।

उन्होंने बताया कि केवल यह कह देना कि "मैं जनहित में जानकारी मांग रहा हूँ" पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि आवेदक को ठोस साक्ष्यों के साथ व्यापक जनहित प्रमाणित करना होगा। यदि ऐसा नहीं होता है, तो जन सूचना अधिकारी धारा 8(1)(j) का उल्लेख करते हुए आवेदन निरस्त कर सकते हैं।