रायपुर: सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के तहत सरकारी कर्मचारियों के व्यक्तिगत दस्तावेजों, सर्विस रिकॉर्ड और व्यक्तिगत जानकारियों को सुरक्षा प्रदान करने वाले उच्च न्यायालयों एवं उच्चतम न्यायालय के हालिया एवं पूर्व निर्णयों का अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संरक्षण आयोग (छत्तीसगढ़ प्रदेश) ने स्वागत किया है।सर्विस रिकॉर्ड लोक सेवक की व्यक्तिगत जानकारी है, उसे लोक सेवक की सहमति के बिना या व्यापक जनहित साबित किए बिना आरटीआई में साझा नहीं किया जा सकता। न्यायिक व्याख्याओं में इसे कड़ाई से लागू किया जाना चाहिए।
हाल ही में बिलासपुर हाईकोर्ट ने रायगढ़ जिले के लैलूंगा में पदस्थ पटवारी रामनाथ सिंह की याचिका [ *W.P.(C) No. 3645 of 2026* ]पर ऐतिहासिक निर्णय सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि लोक सेवकों के जाति प्रमाण पत्र, निवास प्रमाण पत्र, शैक्षणिक दस्तावेज, हलफनामे और सर्विस रिकॉर्ड उनकी व्यक्तिगत जानकारी के दायरे में आते हैं यह धारा 8(1)(j) के तहत संरक्षित हैं और बिना जनहित के इन्हें साझा नहीं किया जा सकता। जब तक मामले में कोई बड़ा और व्यापक जनहित सिद्ध न हो, तब तक सूचना का अधिकार अधिनियम, के तहत ऐसी निजी जानकारियों को सार्वजनिक नहीं किया जा सकता।
ऐसे ही एक मामले में सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक निर्णय (3 अक्टूबर 2012 - गिरिश रामचंद्र देशपांडे बनाम केंद्रीय सूचना आयुक्त *2013 1 SCC 212* ) के केस में भी देखने को मिला था. सर्वोच्च न्यायालय ने ऐतिहासिक आदेश में प्रतिपादित किया था कि किसी भी शासकीय कर्मचारी का सर्विस रिकॉर्ड, शो-कॉज नोटिस, संपत्ति का ब्योरा और अनुशासनात्मक कार्रवाई से जुड़े दस्तावेज उनकी 'निजी जानकारी' हैं। जब तक इसमें कोई स्पष्ट सार्वजनिक हित न जुड़ा हो, जन सूचना अधिकारी ऐसी जानकारी देने के लिए बाध्य नहीं हैं।
कैनरा बैंक बनाम सी.एस. श्याम ( *सुप्रीम कोर्ट - 2018* ) में सर्वोच्च न्यायालय ने पुनः स्पष्ट किया कि कर्मचारियों के व्यक्तिगत ट्रांसफर, पदोन्नति और वेतन से जुड़ी निजी जानकारी देना सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत अनिवार्य नहीं है। सूचना का अधिकार अधिनियम का उपयोग अधिकारियों को परेशान करने, दबाव बनाने या निजी वैमनस्य निकालने के लिए नहीं किया जा सकता। यदि मांगी गई जानकारी प्रशासनिक व्यवस्था में बाधा डालती है या बिना किसी जनहित के किसी की निजता का हनन करती है, तो उसे निरस्त करने का पूर्ण कानूनी अधिकार जन सूचना अधिकारियों के पास है।
*अध्यक्ष प्रद्युमन शर्मा की आम जनता और अधिकारियों से अपील* :-"पारदर्शिता और जवाबदेही तय करने के लिए सूचना का अधिकार अधिनियम एक सशक्त माध्यम है। जिस प्रकार एक जागरूक नागरिक को सूचना के अधिकार के तहत सही जानकारी प्राप्त करने के प्रति सजग रहना चाहिए, ठीक उसी प्रकार शासकीय विभागों में कार्यरत अधिकारियों एवं कर्मचारियों को भी अपने विधिक व संवैधानिक अधिकारों के प्रति जागरूक रहना आवश्यक है। यदि किसी आवेदक द्वारा लोक सेवक की व्यक्तिगत जानकारी मांगी जाती है, जिसका किसी सार्वजनिक गतिविधि से संबंध नहीं है, तो जन सूचना अधिकारी अधिनियम की *धारा 8(1)(j)* का उल्लेख करते हुए आवेदन को सीधे निरस्त कर सकते हैं। शासकीय अधिकारी भी संविधान के तहत निजता के मौलिक अधिकार के हकदार हैं। बिना जनहित के निजी दस्तावेजों का सार्वजनिक होना उनकी सुरक्षा और सम्मान के प्रतिकूल है। पारदर्शी शासन और निजता के अधिकार के बीच संतुलन बनाए रखना ही न्यायपूर्ण व्यवस्था का आधार है। किसी भी कर्मचारी/अधिकारी का सर्विस रिकॉर्ड या व्यक्तिगत फाइलें बिना वैध प्रक्रिया ( *धारा 11* ) और बिना प्रमाणित जनहित के किसी भी अन्य आवेदक को प्रदान नहीं की जा सकतीं। *केवल यह कह देना कि " मैं जनहित में जानकारी मांग रहा हूं " पर्याप्त नहीं है।*
आवेदक को ठोस साक्ष्यों के साथ यह प्रमाणित करना होगा कि उस विशिष्ट सर्विस रिकॉर्ड के प्रकटन से समाज या जनता का क्या व्यापक हित जुड़ा है। "
आयोग सभी जन सूचना अधिकारियों और शासकीय कर्मचारियों से अपील करता है कि वे सूचना का अधिकार अधिनियम की विभिन्न धाराओं और न्यायालय द्वारा दिए गए इन महत्वपूर्ण निर्णयों का अध्ययन करें, ताकि किसी भी कर्मचारी के निजता एवं मौलिक अधिकारों का हनन न हो।